
क्या पाया क्या खोया मैंने,जाना ये तनहाई में,
चल पड़े हैं घर से दूर,संग अपनी परछाई के,
नहीं है कोई साथ हमारे,फिर भी चलते जाना है,
दुनियां की है बात निराली,ज़ालिम ये जमाना है,
अब जाना ये दुनियादारी,करती है परेशान हमें
छूट गया है बचपन सारा,आ गई समझदारी हमें,
हो गए हैं घर से दूर,कैसा ये जीवन का खेल,
करते हैं हर दिन काम,ऐसा है समय का फेर
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