
कैसा ज़माने का ये दस्तूर है
जिसे पाना चाहा वो बहुत दूर है,
दिल को बहलाने की कोशिस की बहुत
तुझे याद करने को दिल मजबूर है ।
तिरे साथ को तरसते हैं दिन-रात हम
तिरे ख्यालों में डूबे रहने में मशगूल हैं
मोहब्बत की खुशबू रहती है हर तरफ
मेरे महबूब की अदायें इतनी खूब हैं।
मेरी राह में आई कितनी ही परेशानियां
मेरे साथ मेरे हमदम हर वख्त तिरा सूरूर है
कुछ तो तिरे दिल में है मेरे लिए जज़्बात
मेरे अहसास अब-तक तिरे यादों में महफूज़ है ।
लाख सितम करले ये ज़माना मुझ पर
साथ रहे तिरा मुझे सब कबूल है
जो भी हो फरमान हो तिरा मेरे लिए
मिले तिरे कुछ लम्हात मुझे मंज़ूर है ।
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