Saturday, March 13, 2010

अपनी पीड़ा

अपनी पीड़ा

अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ
कितने दुख मैं हरती जाऊ,
आए ना अब तो साजन मोरे
कैसे अब मैं मन बहलाऊ

अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ....

रोज़ का ये है मेरा अफसाना
इंतज़ारा करना,सपने सजाना
कैसे दिल का हाल सुनाऊ
अपनी पीड़ा किसे बताऊ
कितने दुख मैं हरती जाऊ...

दिल कहता है अब तो झूमू
पगली बनके हर दम घूमू..
कैसे तुमको मैं समझाऊ
अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ

देख मेरे तू नखरे सजना
आखों में कजरा,बालों में गजरा
हर दिल मैं अब खुद को सजाऊ
अपनी पीड़ा किसे सुनाऊ

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